ये शहर है आशियाना,
ना समझना तुम इसे फँसाना,
यही तो है मंज़िल का तराना,
क्यों करता है रे बहाना॥
देख ज़रा उन समंदर की लहरों को,
कभी इन्हें ना मापना पैमानों में,
मन में ना उठाना तू सवाल,
खो जाना उन सपनों में॥
बड़ी शिद्दत से आज मिली आज़ादी है,
अब ना सोच तू बर्बादी,
गिले-शिकवे भूल जा,
बना ले विचारों को फौलादी॥
ना बहका तू मन को,
खड़ा कर ले तन को,
नहीं मिलेगा ऐसा जीवन दोबारा,
ये शहर है अब जीने का सहारा॥
ये शहर है आशियाना,
ना समझना तुम इसे फँसाना॥
- भुनेश्वर अनंत
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