समय का हिसाब
खुद को मैंने चतुर समझा,
मुझसे चतुर तो वो निकला,
मैं तो मर गया दोस्ती में,
वो मुझे ही बावरा समझ लिया ।
सींचा था जिस रिश्ते को मैंने,
भरोसे की हर एक धार से,
उसने ही तार-तार कर डाला,
अपनी बेईमानी की तलवार से।
मैंने सोचा—वाह रे ऊपरवाले,
ये कैसा तेरा न्याय है?
दगाबाज़ को तूने सब दे डाला,
और मेरे हिस्से में सिर्फ़ तन्हाई ।
तभी ऊपर से आवाज़ आई—
“बेटा, ज़रा सबर कर,
मेरा नाम समय है,
मैं किसी का हिसाब नहीं भूलता,
बस हिसाब लेने में थोड़ा वक्त लगता ।
आज मुझे गिराकर वो खुश है,
दोनों हाथों से खुशियाँ समेट रहा है,
शायद उसे लगता है जीत गया वो,
और मेरा वक्त पीछे छूट रहा है।
मगर समय फिर मुस्कुराकर बोला—
“मैं एक बार फिर लौटूँगा,
वही दिन होगा, वही रात होगी,
न कोई मुगालते में रहे,
न हर जीत हमेशा साथ होगी।”
किसी की दुनिया उजड़ेगी,
तो किसी का घर आबाद होगा,
जिसने जैसा बोया है जीवन में,
एक दिन वैसा ही उसका हिसाब होगा।
आज तू खुश है मेरे गिरने पर,
कल तेरा भी इम्तिहान होगा,
समय की अदालत में,
हर चेहरे का अपना बयान होगा।
न शिकायत है, न बदला लूँगा,
बस समय पर विश्वास रहेगा,
जिसने मेरे भरोसे को तोड़ा है,
एक दिन उसे भी अपने कर्मों का एहसास होगा।
- भुनेश्वर अनंत