मैं, मैं, तू क्या करता है?
कभी तो इस मैं से आगे निकल जा।
इस मैं ने किया कितना जीवन खराब,
फिर क्यों होता है तू मुझसे नाराज़?
मैं ही तो है,
जिसने बावरा बनाया,
जग से तुझे लड़ाया।
खेल सारा मैं का,
दोष किसी और का।
मैं से हम हो जा,
फिर देख ज़िंदगी कैसे कटती है।
दादी-नानी ने सिखाया था गुर,
फिर हम क्यों हो गए दूर?
कर ले चिंतन तू ज़रूर,
न बना इस मैं को हुज़ूर।
फिर देख अपने मन का सुरूर,
कहीं यही न बन जाए तेरा गुरूर।
-भुनेश्वर अनंत