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उधारी की कविता

Bhagwat Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब मैं एक प्रशिक्षु कवि था
        
                                                    
                            
मेरे गुरुदेव थे कवि गोपाल दास मैं उके साथ
अक्सर कवि सम्मेलनों मे जाता था
गुरुदेव के कविता पर खूब ताली बजाता था
एक बार हुआ यों कि एक छोटे कवि सम्मेलन
मुझे आमंत्रित किया गया था
मेरे पास कोई मेरे लिखित अच्छी कविता नहीं थी
" गुरुदेव शरणं गच्छामि "अलावा कोई विकल्प नहों था
मै गुरुदेव के घर गया और गुरुदेव के चरण स्पर्श किया
उनके पास अर्जी लगाई
गुरुदेव ने अर्जी स्वीकार कर लिया था
पर एक शर्त भी मुझ पर थोपा था
फिर गुरुदेव किसी सोच में डूब गए थे
मैं उनकी तन्द्रा तोड़ने की जुर्रत किया था
तो उनकी तन्द्रा टूट गई थी
फिर उन्होने अपनी पुत्री को आवाज दी
बेटा सोहन के लिए कुछ जलपान लाना
"जी पिताजी" कह कर रोसोई कमरे तरफ गयी होगी
इस व्यवहार से मैं चकित एवं भ्रमित था
कुछ समय के पश्चात कविता स्वयं पधारी
साथ में एक ट्रे में विभिन्न प्रकार की मिठाई
और करारे नमकीन सजा हुआ था
इसे लानी वाली सख्त काली नव यौवना थी
उसने मेज पर ट्रे को रखा और पास की कुर्सी में
नजाकत और धमाके के साथ कुर्सी बैठ गई
इस बीच गुरुदेव एक कविता का चयन कर
कागज मेरे हाथ में थमा दिया था
और कहा कि पुत्र ये कविता तुम्हारे लिए सटिक है
यह कह कर यह कविता बहुमूल्य कृति है
इस समय इशारा अपने पुत्री ओर था
मैं किं कर्तव्य विमूड हो गया था
जिस कारण मैं लगभग मूक हो गया था
मौनं स्वीकृत मान कर गुरुदेव
अंदर से सभी रिश्तेदारों को कमरे आने को कहा
कविता के मम्मी ,भाई और अन्य सगे संबंधी
कमरे में एकत्रित हो गये और शोर मच गया था
गुरुदेव ने उत्साहित स्वर में बोले
दामाद राजी हो गये हैं ,पुत्री इनकों गुलाब के हार से
इनका भव्य स्वागत करो ,कमरा तालियों गूंज उठा था
इस तरह से एक नगद कविता के साथ एक उधारी की कविता प्राप्त हुआ और खबर सर्वत्र व्याप्त हो गया था
-भागवत प्रसाद नायक
10 महीने पहले
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