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जवानी दीवानी

Bhagwat Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम थे छुटपन के दोस्त पास-पास रहते थे
        
                                                    
                            
हम दोनो के परिवार में आपस में घुले मिले थे
कभी मैं उसके घर, कभी वो मेरै घर में
साथ-साथ स्कूल जाते थे क्योंकि शहर में
एक ही अंग्रेजी माध्यम स्कूल धी शहर में
कक्षा में छात्राएँ पहली कतार में बैठती थीं
दूसरी कतार सब के साथ मैं भी बैठता था
हम दोनो का परिवार के मुखिया व्यापारी थे
हम दोनो का परिवार के एक ही जाति के थे
कुछ बरसों बाद
हायर सेकेन्ड्री के दसवीं कक्षा में पहुंच गये थे
अब वो बायोलॉजी और मैं गणित सेक्सन थे
उम्र बढने कारण दूरियाँ धोरे-धीरे बढती जा रहीं थी उसके शरीर में ऊभार स्पष्ट दिखाई पड़ने लगा था
शरीर के साथ चेहरे परिवर्तन स्पष्ट दिखाई पड़ते लगा था
गुलाबी चेहरे में दो हरिणी जैसी बड़ी-बड़ी आंखें
करीने से कटे काले -काले घुंघराले बाल
बेहद खूबसूरत और चंचल आंखों और चाल
में नजाकत और लचक मुझे बहुत भाने लगी थी
पर उस पर परिवार के नजर पीछा करती थी
मौका निकाल कर हम दोनो मिलते रहते थे
प्यार बढने लगी थी मिलने की प्यास बढ़ लगी थी
उसके बड़े भाई विवाह में एक रात बदन एक हो गया
फिर प्रेम पीपासा के साथ दुश्वारियां बढने लगी
तन से तन ,मन से मन एकदम करीब आ गई
जवानी दीवानी ही थी और ये सब उसके मनमानी थी
-भागवत प्रसाद नायक
10 महीने पहले
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