,बसंत की बयार चली
प्रेमियों के हृदय में उठी उन्माद
आम्र पत्र बिछुड कर
धरती पर बिखरे पड़े हैं धरती पर
ये निर्मोही वृक्ष को नहीं खली
बसंत की बयार चली
मोह, प्रेम ने ऐसी चाल चली
आसक्त हुए प्रेमीजन
उन्मुक्तता से जल उठी तन-मन
बिछृडै प्रेमी-प्रेमिका प्यास जग उठी
यह कैसा बंसत बहार
तडफ रहे बिछुड़ों को
कोई संदेश देते बसंत बयार
बंसत की बयार चली
उन्मुक्तता के लिए मची खलबली
- भागवत प्रसाद नायक