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मौन की साधना

Babu Ratanpura

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भौतिकता के इस शिखर पर, सुविधा के अंबार लगे,
        
                                                    
                            
उंगलियों पर दुनिया थमती, सपने सारे पास ठगे।

दूरियां सिमटीं, गति बढ़ी है, हर इक शय की चाह यहाँ,
पर भीतर का सूनापन क्यों चीख रहा हर आह यहाँ?

दौड़ करियर की, भागमभाग, प्रतिष्ठा का यह अंधा शोर,
डिजिटल युग के कोलाहल में खोया मन का हर इक छोर।

बाहर से तो सफल जगत में, भीतर गहरी पीर जगी,
तनाव, अकेलापन, खालीपन, जीवन की यह कैसी ठगी?

ऋषियों की इस पावन माटी में, सदियों पहले खोजा ज्ञान,
मौन साधना से ही मिलता उर को सच्चा अमृत-दान।

मौन नहीं बस होंठ सीना, यह तो अंतस का विस्तार,
कोलाहल में दीप जलाना, भीतर का पावन उपहार।

शोर थमे तो सुर बजते हैं, सुर में मिलती सच्ची शांति,
मौन थाम ले हाथ अगर तो मिट जाती मन की हर भ्रांति।

आत्मा की शुद्धि का रस्ता, इस मरुथल की ठंडी छांव,
मौन समेटे सब उत्तर जब शांत हो जाए जीवन-गांव।
-बाबूलाल पारीक 
एक महीने पहले
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