भौतिकता के इस शिखर पर, सुविधा के अंबार लगे,
उंगलियों पर दुनिया थमती, सपने सारे पास ठगे।
दूरियां सिमटीं, गति बढ़ी है, हर इक शय की चाह यहाँ,
पर भीतर का सूनापन क्यों चीख रहा हर आह यहाँ?
दौड़ करियर की, भागमभाग, प्रतिष्ठा का यह अंधा शोर,
डिजिटल युग के कोलाहल में खोया मन का हर इक छोर।
बाहर से तो सफल जगत में, भीतर गहरी पीर जगी,
तनाव, अकेलापन, खालीपन, जीवन की यह कैसी ठगी?
ऋषियों की इस पावन माटी में, सदियों पहले खोजा ज्ञान,
मौन साधना से ही मिलता उर को सच्चा अमृत-दान।
मौन नहीं बस होंठ सीना, यह तो अंतस का विस्तार,
कोलाहल में दीप जलाना, भीतर का पावन उपहार।
शोर थमे तो सुर बजते हैं, सुर में मिलती सच्ची शांति,
मौन थाम ले हाथ अगर तो मिट जाती मन की हर भ्रांति।
आत्मा की शुद्धि का रस्ता, इस मरुथल की ठंडी छांव,
मौन समेटे सब उत्तर जब शांत हो जाए जीवन-गांव।
-बाबूलाल पारीक
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X