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झुका हो सर इबादत में, निगाहों में हबीब आए।

Azhar Sabri

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये कैसा हुस्न है, जलवा मिरे दिल के क़रीब आए।
        
                                                    
                            
झुका हो सर इबादत में, निगाहों में हबीब आए।

गए मस्जिद से उठकर शेख़ जी, बोले ज़रा हँसकर,
हमें क्या ख़ौफ़-ए-महशर हो, अगर हूरें नसीब आएँ।

मोहब्बत में कभी ऐसा भी होता है, कहो यारो,
क़दम बहके हुए हों और वो बनकर तबीब आए।

न जाने कौन-सा रिश्ता है मेरी रूह का उससे,
वो जितना दूर जाए, उतना ही दिल के क़रीब आए।

न माँगी उम्र भर मैंने कोई दौलत, कोई शोहरत,
दुआ में बस ये माँगा, वो मिरा बनकर नसीब आए।

 
एक महीने पहले
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