आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

झुका हो सर इबादत में, निगाहों में हबीब आए।

                
                                                         
                            ये कैसा हुस्न है, जलवा मिरे दिल के क़रीब आए।
                                                                 
                            
झुका हो सर इबादत में, निगाहों में हबीब आए।

गए मस्जिद से उठकर शेख़ जी, बोले ज़रा हँसकर,
हमें क्या ख़ौफ़-ए-महशर हो, अगर हूरें नसीब आएँ।

मोहब्बत में कभी ऐसा भी होता है, कहो यारो,
क़दम बहके हुए हों और वो बनकर तबीब आए।

न जाने कौन-सा रिश्ता है मेरी रूह का उससे,
वो जितना दूर जाए, उतना ही दिल के क़रीब आए।

न माँगी उम्र भर मैंने कोई दौलत, कोई शोहरत,
दुआ में बस ये माँगा, वो मिरा बनकर नसीब आए।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर