ये कैसा हुस्न है, जलवा मिरे दिल के क़रीब आए।
झुका हो सर इबादत में, निगाहों में हबीब आए।
गए मस्जिद से उठकर शेख़ जी, बोले ज़रा हँसकर,
हमें क्या ख़ौफ़-ए-महशर हो, अगर हूरें नसीब आएँ।
मोहब्बत में कभी ऐसा भी होता है, कहो यारो,
क़दम बहके हुए हों और वो बनकर तबीब आए।
न जाने कौन-सा रिश्ता है मेरी रूह का उससे,
वो जितना दूर जाए, उतना ही दिल के क़रीब आए।
न माँगी उम्र भर मैंने कोई दौलत, कोई शोहरत,
दुआ में बस ये माँगा, वो मिरा बनकर नसीब आए।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X