दोहा त्रयी
प्यास बुझाता है नहीं, क्या जनता क्या भूप।
कितना निष्ठुर हो गया, आज गांँव का कूप।।
राजमार्ग तो श्रेष्ठ हैं, होती डगर अछूत।
लगे हुए जो पेड़ हैं, लगते हैं अवधूत।।
देख समय की है नदी, कैसा हुआ बहाव।
अमन-चैन की पीठ पर, चाकू के दो घाव।।
-अविनाश ब्यौहार