बरसात के साथ रात
ये मेल ज्यादा डरावना हो जाता है
जैसे एक कुआँ
उसमें बेरोक गिरते चले जाना
जैसे एक गीलापन
जो चुभता हो चमड़ी पर
जैसे कोई स्याहपन
जो आँखों को चूम रहा हो
मन की सीमाओं के
बाहर जैसे कोई डर
ताक में हो
हर अहसास को दबोचने के लिए
दरवाजे के पीछे
दीवारों के अंदर-अंदर
एक जिस्म एक बेचैन रेत में धँस रहा हो
बढ़ती बरसात, उमड़ती रात
उदास वक़्त को बहा ले जाने के लिए तैयार हो।
बरसात के साथ रात
जिंदगी को यूं घूरती है
जैसे शिकारी शिकार की मजबूरी को
साँसे लड़खड़ा जाती है
दुखों के धक्कों से
हर बूँद वजन बढ़ा देती है जर्जर छत का
रात चोर सी कूदती है
दबे पाँव घर लूटने को
सुकून ओढ़ने के लिए हाथ ढूँढ़ता हूँ लेकिन
याद आता है
इस रात के छोर पर सुबह नहीं है..
-अवतार सिंह अक्षरजीवी