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विचित्र विधान

Atul Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी पाषाण, कभी मोम, कभी दिल को फ़साना कहा गया,
        
                                                    
                            
इस हृदय को जाने कितने रूप में बेगाना कहा गया।

उसके सौंदर्य के आगे शब्द भी मौन थे मेरे,
चंद्र को मुख, अलकों को रात्रि का ठिकाना कहा गया।

मानो तो ये कक्ष भी बंधन से कहाँ कम है,
चार दीवारों के घेरे को क्यों ठिकाना कहा गया।

जो वश में था ही नहीं, वही मन में उतरता रहा,
अनायास अनुराग को क्यों हृदय का तराना कहा गया।

विचित्र विधान था उस प्रेम-सभा का,
ख़ाक था, फिर क्यों मुझे ख़ज़ाना कहा गया।

जिसे विस्मृत करना था, वही स्मृति बना रहा,
इस मोह को भी अंततः प्रेम की व्यथा कहा गया।
बस संभाल कर रखता हूँ दर्द की दवाएं नज़दीक अपने,
जाने कब वियोग का फरमान बे-सुध मुझे कर गया।
-बेसुध
एक महीने पहले
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