मेरे गाँव की मिट्टी की चिट्ठी
आई है कई बार मुझ तक,
फाड़ देता हूँ बिना पढ़े उसको,
कायर हूँ—मिटा देता हूँ अस्तित्व उसका।
खड़िया से तखती पे लिखे हर्फ़
डरता हूँ शायद उन अक्षरों से,
जिनमें मेरा बचपन लिखा होगा,
उन धूल भरे रास्तों से,
जहाँ मेरा हर क़दम बसा होगा।
छाँव बाट जोहती होगी मेरी,
डरता हूँ उस बूढ़े नीम से,
जो इंतज़ार में ज़ईफ़ हो गया होगा,
उस आँगन से, जहाँ दादी की हँसी
शायद आज भी नाम मेरा पुकारती होगी।
तरक्की जिसे कह भरमाता रहा ख़ुद को,
शहर के खंडहरों में दिया जलाने को,
मैंने मिट्टी की अंगीठी से आग छीन ली—
और मैं भी किसका वफ़ादार निकला,
अपनी ही जड़ों से दूरी चुन ली।
अपने अतीत से नहीं मिलता
अब डरता हूँ कहीं एक दिन
वो पैग़ाम आना ही बंद न कर दे…
क्योंकि तब समझूँगा—
गाँव ने मुझे नहीं,
मैंने गाँव को खो दिया है।
— बेसुध