मुस्कुरा के कर गए तन्हा,
तहज़ीब का बहाना करके।
हम तो समझे थे साथ देंगे उम्रभर,
वो चले गए हमें बेकरार करके।
नींद तो है आँखों में, क्यूँ सोती नहीं,
गुज़ार दी रात हमने सूने ख़्वाब बुनके।
अजीब शख़्स था वो—बिछड़कर भी,
दिल में रहा, मगर ख़ुद को दूर करके।
हमने तो हर दुआ में माँगा था उसे,
वो मिला भी तो हमें अधूरा करके।
जिसे खोने का डर न था ज़हन में कभी,
वही छोड़ गया हमें अपना करके।
वो पूछते हैं—“कैसे हो अब?”
काश कह पाते—“ख़ुश हैं… तुम्हें खो के।”
अब किसी से दिल लगाने का मन नहीं,
बैठे हैं ख़ुद ही ख़ुद का ख़सारा करके।
कभी लौटे तो पूछेंगे उससे बस इतना—
क्या मिला हमें यूँ तन्हा करके?
हम तो आज भी वहीं खड़े हैं,
जहाँ छोड़ा था तुमने मुस्कुरा करके।