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फिर इश्क़ कैसा…

Atul Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            और किस हिज़ाब से छुपाऊँ मैं दौलत अपनेपन की,
        
                                                    
                            
तुमसे मोहब्बत है तो फिर राज़ कैसा…

लर्ज़ता हूँ मैं हर ओर से आती हुई सदाओं से,
तेरा नाम सुनाई दे तो फिर ख़ामोशी का लिहाज़ कैसा…

तुम्हें चाहना कोई ख़ता नहीं, मगर डरता हूँ,
कि मेरा इश्क़ पढ़ न ले ये ज़माना—फिर छुपाव का पर्दा कैसा…

तुमसे जुड़कर ही तो जाना है मैंने ख़ुद को,
तुमसे बिछड़कर इस शहर में मेरी पहचान कैसी…

तुम मेरे पास नहीं, फिर भी मेरी रूह में बसे हो,
इससे बढ़कर किसी रिश्ते का कोई सबूत कैसा…

मैंने तुम्हें माँगा नहीं, बस तुम्हें महसूस किया है,
जिस मोहब्बत में माँग न हो—उसका फिर हिसाब कैसा…

अगर इश्क़ ही मेरी सबसे बड़ी दौलत है,
तो तुम्हारा नाम छुपाकर रखूँ भी तो आखिर कैसे…

तुम्हें चाहना मेरी ख़ामोशी में लिखा हुआ सच है,
अब इस सच से भी करूँ कोई इनकार—तो फिर इश्क़ कैसा…
-बेसुध
एक महीने पहले
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