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कुछ भी पहले-सा न रहा।

Atul Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो रोकते रहे मुझको,
        
                                                    
                            
पाबंदियों का डर दिखा कर,
मैं भी नादान था कितना—
मान गया, सर झुका कर।

अब रातें जागती हैं,
मैं चुप रहता हूँ।
चाँद खिड़की पर ठहरा है,
मैं भीतर से ढहता हूँ।

घड़ी चलती रहती है,
वक़्त मगर रुक-सा गया।
उसके बाद इस कमरे में
कुछ भी पहले-सा न रहा।

दरवाज़ा अब भी सुनता हूँ,
आहट कोई होती नहीं।
दिल अब भी उसे पुकारे,
होंठों से आवाज़ आती नहीं।

तकिया गीला मिलता है,
आँखें रोती नहीं।
कुछ दर्द ऐसे होते हैं—
जिनकी आवाज़ होती नहीं।

वो अपनी दुनिया में होंगे,
मैं अपनी ख़ामोशी में हूँ।
बस फ़र्क इतना है—
वो आगे बढ़ गए,
मैं अब भी वहीं खड़ा हूँ।
-बेसुध
एक महीने पहले
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