विज्ञापन

भारत बंद है..

Atul Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हाट भी बंद हैं गांव भी बंद हैं
        
                                                    
                            
चलते-फिरते पांव भी बंद हैं।
कहां जाऊं मैं भोजन करने,
गुजरते दिन, रोजी-रोटी बंद है।

आटा कम है राशन कम है
हम जैसों को विकल्प भी कम हैं।
कैसे बचेंगे इस महामारी में,
हम जैसों को आश भी कम है।

घर से बेघर कोई अपना बंद है
वापस आतीं ट्रैन भी बंद हैं।
हो सके तो भिजवा देना,
घर से बेघर जो बाहर बंद हैं।

बढ़ते दिन और हौंसले कम हैं
अनुदान हेतु कागज भी कम हैं।
महामारी में जान बचेगी? भूखे कैसे?
भारत बंद है, स्त्रोत भी कम हैं।

अतुल कुमार


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Adv DK Kanojiya

71 कविताएं

View Profile