हे मृत्यु तेरा अभिनन्दन करता हूं शत शत वन्दन शरण तेरी आने को व्याकुल प्राण करें स्पंदन। मिथ्या जगत की मिथ्या माया सार न सीखा मन भरमाया
भटक रहा हूं जनम जनम से आत्मा ने परमात्मा न पाया।
शरीर बीज है जीवन चेतना
आत्मा में था अंकुरण फूटना
मनुष्य वृक्ष मैं बन न पाया
कृष्णपक्ष का था बिखरा साया।
ऑखों के सब ऑसू सूखे
प्रार्थनाओं के शब्द अनूंठे गाना था पर गा न पाया
आ मृत्यु ने सन्देश सुनाया।
अंत समय मन करता क्रन्दन
जीवन की विषधरता का अर्पण प्राणवायु की ओढ़ चुनरिया मौत ले चली पीव अपने भवन।
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