नयनों में नीर लिये, ह़दय अधीर लिये
प्राणों में पीर लिये, दर्दभरी तस्वीर लिये
काकी ने जग से नाता तोड दिया।
जीवन का साज, ओम का आगाज
अटूट नाते का राज, सबको है नाज
असीम दर्द हराकर, काकी ने मुंह मोड़ लिया।।
आह की आग से खेलती,
दिल के जख्मों को कुरेदती
पति का गम झेलती,अपने दम पर बच्चों को सहेजती
कहीं भली थी कहीं बुरी थी,
ऐसी काकी ने जीवन छोड दिया।।
एक दिन पहले ओम के संग मिला,
तब काकी को देखा था
जीवनसाज के सब तार हिले दिखे,
आया समझ विधि का लेखा
पीव काकी तो घर परिवार को बेगाना कर,
जग से नाता तोड़ चली
जो भी अच्छा बुरा है उनका जीवन,
वे किस्से सारे छोड़ चली।
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