बाबा,दादा
हमने
आपसे सीखा है कि
जवानी
और बुढ़ापा
तन का नहीं,
मन का है
और
मन का गणित
ऐसे नहीं गिना जाताा
आपके/ इस तन की
चेहरे की झुर्रियों को
मंद गति से
वक्त के पहिये पर
सवार बुढावे का
सफर करते
मैंने अपने
बाल्यावस्था से
बढते देखा है और
आपकी अंगुली के पोरों से
और मुस्कान के साथ
रसीले शब्दों से
सदा ही शुभाषीष पाया है
मेरा मन आज
गणित और गिनती
भूलना चाहता है
और दिल चाहता है
आप ऐसे ही
कई संवत्सरों तक
अपनी सहज, सरलता का
सफर करते रहे
आप कई संवत्सर से
जीते आये है
आप ऐसे ही
और कई संवत्सर तक
जीते रहे
ताकि पीव
आपके बिना
शहर होशंगाबाद
कहीं पराया न हो जाये
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