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अंतरिक्ष में दफन होते शब्द

Atmaram Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अंतरिक्ष में दफन होते शब्द
        
                                                    
                            

रात की काली पलकें
जैसे आकाश ने मून्दी हो अलकें
भयाभय घनघोर काली है
मानों सारी अराजकता को समेटे
वसुन्धरा के लघुत्तम जीव से
सभी प्राणियों-वनस्पतियों के
उच्चारित शब्दों को
हृदय के भावों-पीड़ाओं कोे
अंतरिक्ष में दफन कर रही हैं।
ये शब्द इस धरा के
हर प्राणी के मुख से
सोते-जागते स्पन्दित है
एक चींटी की फुस्फुसाहट चीख से लेकर
एक भयाभय विशाल प्राणी की संवेदनाओं तक
अंकन करता है यह परमव्योम।
छोटी सी घास के तिनके या
लघुत्तम पौधे या पेड़ के पत्ते
अपनी टहनी से जब नोचे जाते है
तब घास और पौधे के भीषण दर्द को
वायु संवाहक बनकर
पहुंचाती है व्योम को
और यम के लेखे में
दर्ज होती है सबकी करनी।
धरती के प्रथम जीव,वनस्पति से लेकर
कोटिशः मानवों की तबसे
आज तक की संतति तक
यानि आपकी सभी पीड़ियों से आप तक
सभी की करूणा,दया,वेदना
प्रार्थना,दुआ-बददुआ या
दर्दभरी चीख की संवेदनाओं की सिसकियां
अंतरिक्ष में हुंकार मार रही है।
अंतरिक्ष का यह मायाजाल
अपनी संप्रभुता के साथ
सदियों से हर मनुष्य,प्राणी वनस्पति के
एक-एक स्वर,शब्द और वाणी का
संग्राहालय बना हुआ है
और उसके जन्म से मृत्यु तक के
एक-एक पल, एक एक क्षण की
गुंजित हर ध्वनि,किये गये
कर्म-अकर्म और विकर्म का साक्षी है
और पराजगत का प्रमाणित दस्तावेज।
आकाश के इन अमिट दस्तावेजों को
समय की परिधि से निकालकर
पुर्नजीवित करने का अज्ञेय ज्ञान
कभी प्रगट कर सकेगा इंसान
यह समय के चक्रपातों में उलझे
उसके विवेक के लिये पीव
काला अक्षर भैस के बराबर ही हैं।
शरीर मरता है शब्द नहीं मरते
खुद को जीवित रखने के लिये
कन्दराओं-पहाड़ों के शिखर पर
इंसान उकेर आता है
अपने नाम के शब्द और लकीरें
शब्द वैसे ही जीवित रहते हैं
जैसे जिस भाव से उपजते हैं
शब्द गाना,गाली,रोने धोने वाले
आर्तनाद, सिंहनाद लिये होते हैं।
जिसके मुख से ये शब्द निकले
शब्द निकालने वाला
उन शब्दों का पिता होता है।
मुख से शब्द निकलने पर
वैमनस्यी गाली-गलौच से लबरेज शब्द
परछाई की तरह अपने पिता के
पीछे अंतरिक्ष में मंडराते है
मरने के बाद भी वे अपने पिता को
खोजकर उनके सहचरी हो जाते हैं।
जो सार्थक प्रार्थनामयी शब्द होते हैं
वे शब्द अपने जन्मदाता को
चिर-परिचित आत्मीयता का
आभास कराते है
मानो आने वाले कल की संरचना
और दुनिया के निर्माण में
इन्हीं शब्दों की निधियाॅ इनसे
पीव जगत संचालित करायेगी।


आत्माराम यादव पीव 

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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