झेल चुका हूँ जो संघर्ष घुटकर,
उस व्यथित संघर्ष का सार हूँ मैं।
थका, गिरा, हारा हूँ तो क्या हुआ?
एक बार पुनः उठने को तैयार हूँ मैं।
धधक रही अंदर जो आग मेरे,
उससे कैसे पा सकता पार हूँ मैं?
नस-नस में दौड़ रही जो बिजली मेरे,
परिश्रांत कैसे हो सकता इंसान हूँ मैं?
कंठ व्याकुल हो उठा हो नीर के बिन,
पर सिंह-सम गरजने को तैयार हूँ मैं।
थक गया था जो मैं यूँ चलते-चलते,
बन चुका अब अश्व-सी रफ़्तार हूँ मैं।
तन-मन में उठ रहा जो उफान मेरे,
मानो सागर-सा कर रहा विस्तार हूँ मैं।
लक्ष्य स्पष्ट हो चुका है सामने जो,
अब कर रहा सारंग पर संधान हूँ मैं।
दबाना चाहती थीं जो बाधाएँ मुझको,
उन विघ्नों का अब कर रहा निस्तार हूँ मैं।
अंतः शक्ति आज भी है जागने को,
अब जा रहा करने पुनरुत्थान हूँ मैं।
— अथर्व तिवारी