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क़तरा-ए-बारां

Astitwa Agarwal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं क़तरा-ए-बारां की तरह झलकाया गया,
        
                                                    
                            
उन्हें याद मेरी बस तब आई, जब शिद्दत-ए-आफ़ताब से सताया गया।

रोज़ मंदिर में मूरतों से ज़्यादा, करता हूँ जिसके दीदार की मन्नत,
आज वहाँ भी मिलने बुलाया उसे, तो इनकार करके रुलाया गया।
एक महीने पहले
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