आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

क़तरा-ए-बारां

                
                                                         
                            मैं क़तरा-ए-बारां की तरह झलकाया गया,
                                                                 
                            
उन्हें याद मेरी बस तब आई, जब शिद्दत-ए-आफ़ताब से सताया गया।

रोज़ मंदिर में मूरतों से ज़्यादा, करता हूँ जिसके दीदार की मन्नत,
आज वहाँ भी मिलने बुलाया उसे, तो इनकार करके रुलाया गया।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर