मैं हूँ मर्यादा,
जिसे सदियों से
स्त्री का आभूषण कहा गया,
पर पुरुष के नियंत्रण की बेड़ियों को
मेरा ही नाम दिया गया।
वही घर की देहरी,
जिसे पार करना
स्त्री का अपराध बना,
और उसी देहरी को
उसके जीवन भर की सीमा कहलायी।
मैंने देखा है—
कैसे स्त्री की चुप्पी को
उसकी सहनशीलता कहा गया,
उसके त्याग को
उसका धर्म बना दिया गया।
फिर अग्निपरीक्षा में
मैंने सीता को ही क्यों पाया?
कृष्ण और राधा ने
प्रेम का अर्थ सिखाया,
फिर विरह ने
राधा को ही क्यों चुना?
सभा में वस्त्र उतरते रहे,
धर्म का शोर उठता रहा;
मौन देखता रहा,
और द्रौपदी की अस्मिता
छलनी होती रही।
हर युग में
मेरे नाम पर
स्त्री को ही समझाया गया—
कहाँ जाना है,
कहाँ रुकना है,
कितना बोलना है,
और कितना सहना है।
पर मैं पूछती हूँ—
मर्यादा यदि सच में मर्यादा है,
तो उसकी सीमाएँ
सिर्फ़ स्त्री के लिए क्यों?
यदि मैं सचमुच मर्यादा हूँ,
तो हर युग में
मेरे नाम पर
स्त्री को ही क्यों आज़माया गया?