ओस की बूँद सा है गुस्सा तुम्हारा,
एक प्यारी सी छूवन की दरकार है;
और फिर तुमको पिघल जाना है।।
बड़ी मासूम है नाराजगी तुम्हारी,
एक दफा सीने से लगाना है तुमको;
और फिर तुमको बरस जाना है।।
बहुत नादानी है जिद में तुम्हारी,
बस लबों को छेड़ने की देरी है;
और फिर क्या तुमको मुस्कुराना है।।
आशुतोष "शज़र"
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