अब याद आती है घर की
पच्चीस गज के कमरे में जीना,
खुद से बातें करना, मुस्कुराना;
तनहाई की कैद में रहना,
अब याद आती है घर की।
कभी जमीन पर सोना,
कभी बिना खाए रहना,
पूरे पूरे दिन बाहर न जाना,
अनजानी मजबूरी को,
हर वक्त महसूस करना,
अब याद आती है घर की।
सफलता की चाहत में,
छोटी-छोटी खुशियों से,
हर दिन मुंह फेर लेना,
खुद से हर दिन लड़ना,
हार के डर में जीना;
अब याद आती है घर की।
उत्साह से भरे कभी थे,
आज पलायन की जद में,
कभी छेड़ कर बात करना,
आज बचकर निकलना,
खुद से कितना दूर आ गये,
अब हमको खुद से मिलना,
बातें हल्की फुल्की करना है,
जिंदगी को अब से जीना है,
घर भी तो नहीं हंसता-खेलता,
उसकी खुशी को पाना है,
फिर घर को जाना है क्योंकि,
अब याद आती है घर की।।
©शज़र
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