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अब याद आती है घर की।।

ashutosh yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब याद आती है घर की
        
                                                    
                            
पच्चीस गज के कमरे में जीना,
खुद से बातें करना, मुस्कुराना;
तनहाई की कैद में रहना,
अब याद आती है घर की।
कभी जमीन पर सोना,
कभी बिना खाए रहना,
पूरे पूरे दिन बाहर न जाना,
अनजानी मजबूरी को,
हर वक्त महसूस करना,
अब याद आती है घर की।
सफलता की चाहत में,
छोटी-छोटी खुशियों से,
हर दिन मुंह फेर लेना,
खुद से हर दिन लड़ना,
हार के डर में जीना;
अब याद आती है घर की।
उत्साह से भरे कभी थे,
आज पलायन की जद में,
कभी छेड़ कर बात करना,
आज बचकर निकलना,
खुद से कितना दूर आ गये,
अब हमको खुद से मिलना,
बातें हल्की फुल्की करना है,
जिंदगी को अब से जीना है,
घर भी तो नहीं हंसता-खेलता,
उसकी खुशी को पाना है,
फिर घर को जाना है क्योंकि,
अब याद आती है घर की।।
©शज़र

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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