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अमां लखनऊ

Ashish Shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चकाचौंध में तुम नहा-धो गये हो,
        
                                                    
                            
अमां लखनऊ तुम कहाँ खो गये हो?
माना तरक्की की लिख दी इबारत,
लखौऱी हटा कर बना दी इमारत,
विरासत छुपा कर कहाँ ले गये हो ?
अमां लखनऊ तुम कहाँ खो गये हो ?

जो भी बची है तुम्हारी विरासत,
देखो तो जा के तुम उनकी हालात,
मैला हुवा तेरे दरिया का पानी,
नज़ाकत नफ़ासत सब किस्से कहानी ,
भुला कर के तुम बदज़ुबां हो गये हो,
अमां लखनऊ तुम कहाँ खो गये हो ?

गंगा ज़मुनी वो तहज़ीब भूले,
अपनी ही मस्ती में हो फूले फूले,
तुम्हारे चमन में जो नये गुल खिले हैं,
इनके तो अपने अलग सिल सिले हैं,
वो रंगत वो खुशबू कहाँ ले गये हो?
अमां लखनऊ तुम कहाँ खो गये हो?

आशीष शुक्ला


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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