चकाचौंध में तुम नहा-धो गये हो,
अमां लखनऊ तुम कहाँ खो गये हो?
माना तरक्की की लिख दी इबारत,
लखौऱी हटा कर बना दी इमारत,
विरासत छुपा कर कहाँ ले गये हो ?
अमां लखनऊ तुम कहाँ खो गये हो ?
जो भी बची है तुम्हारी विरासत,
देखो तो जा के तुम उनकी हालात,
मैला हुवा तेरे दरिया का पानी,
नज़ाकत नफ़ासत सब किस्से कहानी ,
भुला कर के तुम बदज़ुबां हो गये हो,
अमां लखनऊ तुम कहाँ खो गये हो ?
गंगा ज़मुनी वो तहज़ीब भूले,
अपनी ही मस्ती में हो फूले फूले,
तुम्हारे चमन में जो नये गुल खिले हैं,
इनके तो अपने अलग सिल सिले हैं,
वो रंगत वो खुशबू कहाँ ले गये हो?
अमां लखनऊ तुम कहाँ खो गये हो?
आशीष शुक्ला
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