रोको नहीं मुझे जाने दो
अब फर्ज को निभाने दो
तू सोचती मैं ही तेरा
माँ आस कर बैठी मेरी।।
अब कुछ समझ आता नहीं
संकट घिरी माता मेरी
मैं पहुंच जैसे गया
अगर चीर न उनको दिया
तो जान लेना ये प्रिये
नामर्द तेरा है पिया।।
जब गया था वो वहाँ
अफसोस में साथी दिखे
रोष से भर कर कहा
इन्तजार करने के लिए
क्या मां ने है पैदा किया
चलो चीर कर उनको दिखा दो
सुपुत्र मां ने है पैदा किया।।
स्वर मन्द न ललकार कर
सिंह की दहाड़ कर
शत्रु को आगाह कर
कह रोधने आया पिया।।
जय भारती जय घोष कर
उठ वीर सब आगे बढ़
चले मर्दने उन शत्रु को
जो शैल की चोटी बसे
देखकर उनको सभी में
आग सी लपटे जली
काट कर आउंगा ये
संकल्प सब ने मन करी ।।
चले भारती के वीर थे
पर्वत शिखर को चीरते
देखा उन्हें जब शत्रु ने
गोली से था स्वागत किया
वो बीर मा के बेटे थे
स्वीकार हंसकर कर लिया।।
छिड़ गया फिर युद्ध था
कोई बचा न बीर था
बस एक ही वो शेर था
उठ खडा आगे बडा
चिघ्घाड गज सा कर चला
गोली की बौछार से था
मारने रिपु को लगा ।।
चुप नही बैठा वो रिपु भी
मारने वो भी लगा
तन हुआ छलनी था उसका
वीर तिनका न ढिगा ।।
तन हुआ छलनी था उसका
साथ न उसका दिया
लडखडाते वीर फिर वो
आ जमी पर वो गिरा
उठ दौड आई भारती
उसको उठा गोदी लिया।।
भारती कहती तुझे जो
मागना है माग ले
वीर वो हस कर कहा मा
कुछ छणो की साँस दे
अभी कार्य पूरा न हुआ।।
पा गया वरदान जब वो
उठ खडा फिर वीर था
रज से चंदन किया
मारकर सब शत्रु को
तन गाड फिर ध्वज को दिया
कर गिरा वो कार्य पूरा
स्वांस को था खो दिया
गोदी उठा फिर भारती
आचल से तन को ढक लिया
हृदय लगाकर भारती
आंसू से तन नहला दिया।।
आशीष पाण्डेय
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