तुम जितने उर में उतरोगे
उतनी नयन कथायें उलझी होंगी।
यह प्रेम प्रकोप की छाया है
जो हर मानस में हैं उतरी।।
किसकी पीर सुनाऊं या
किसकी पीर छुपाऊं
कुछ पर बीत चुकी होगी
कुछ पर बीत रही होगी...
दूर बसी दो सांसें जो
तड़पन दर्पण में करती हैं।
लिये आस की भाव हृदय में
राह मिलन की तकती हैं।
हंसी ठगी का खेल बना ये
कैसे हाल बताऊं मैं,
एक यहां पर बिलख रही हैं
दूजी वहां बिलखती हैं।
अश्रुधार से लथपथ,
नयनों ने पीड़ा साधी है।
अधरों ने मिलकर समझाया,
पीड़ा कितनी उन्मादी हैं।
अलख पुकारे बांहे ये
बिन तेरे अब चैन कहां,
हम दोनों का नाता ये
जैस दीया की बाती है।
न खुशहाली जयमाला में
न ही ढोलक की थापों में।
बीती तेरी उन बातों से
उलझन है मन के गांव में।
रटन लगी है तन से मन तक
बसू सदा तेरे जीवन में।।
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