ढोलक की थाप पैरों में बंधे घुंघरूओं की
छन-छन और
चटाक -चटाक होती करतल ध्वनियां
न जाने
कितने ही प्रश्न खड़े करती हैं
समाज की इस संवेदनहीन विद्रूपता पर।
हवा आग पानी और
धरती पर बराबर का हक होने के बावजूद
धुंध -कोहरा और अंधेरा क्यों लिख दिया जाता है
इनके हिस्से
इनके हिस्से के चांद -सितारे छीन कर ।
क्यों मुट्ठी भर छांव से भी वंचित कर दिए जाते हैं ये
अभागे
शारीरिक अपूर्णता का यह निर्दयी उपहास और
सदी की
दुर्दांत विडंबना और पंगु समाज की
अपंग सोच की इंतहा है यह ।
आखिर यह विकृति
कब तक रौंदती रहेगी ये अभागी जिंदगियां
और मनुष्य
मनुष्य होने का झूठा दंभ भरता रहेगा
अपने एक हिस्से को
खुद से अलग -थलग करके आखिर कब तक।
दुनिया वालों इन्हें भी उसी तरह अपना लो जैसे
बेटे या बेटी को
अपना लेते हो तुम कलेजे का टुकड़ा कहकर
इन्हें भी इनके हिस्से की
आंचल भर छांव दे दो ताकि ये भी जी सकें
सिर उठाकर
इस बेरहम दुनिया में और बचे रहें
यतीम होने से मां-बाप के होते हुए भी।
-अशोक दर्द