जब ये गांव शहर नहीं हुए थे...
लोग रात को
सोते वक्त चूल्हे में बचे हुए अंगारे राख में दबा देते थे
ताकि सुबह उठने पर
माचिस न होने पर फिर से आग जलाई जा सके।
जिनके घर आग नहीं होती थी वे एक दूसरे के घर से
आग ले आते थे फिर
सबके चूल्हों में एक चूल्हे से ही आग जल जाती थी
सब चूल्हों की
आग फिर सबकी साझा आग होती थी।
कभी ऐसा नहीं होता था कि पूरे गांव के किसी चूल्हे में
आग न जले
घराट से पीस कर लाया आटा बेशक तोलकर ही
परंतु बांटकर खा लेते थे सब क्योंकि
बड़े बुजुर्ग हर चूल्हे में
कर्तव्य समझकर आग जलने का ध्यान रखते थे।
मेले से लाई हुई
आटे और सूजी की मिठाई भी सारे गांव में ऐसे
बांटी जाती थी जैसे
सुदूर किसी मंदिर से लाया हुआ प्रसाद हो।
बेशक अभावों से भरे
होते थे सारे तीज त्यौहार , विवाह शादियां
परंतु हर रिवायत
हृदय की समृद्धि के साथ निभाई जाती थी।
गांव की ये सब बातें
दूर कहीं पीछे छूट गई हैं और अब
कहीं दिखाई नहीं देतीं
जैसे कुएं में गिरा हुआ पत्थर नहीं दिखता।
ये रिवायतें और
ये मोहब्बतों भरी गांव की दुनिया की खूबसूरती
तब की है
जब ये गांव शहर नहीं हुए थे ।
-अशोक दर्द