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ढाबे की अखबार

अशोक दर्द

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ढाबे की अखबार
        
                                                    
                            
आंख खुली तो मैंने स्वयं को
ढाबे की मेज पर पाया ।

सबसे पहले ढाबे के मालिक ने मुझे
उलट पलट कर देखा
उसने मेरे अंग अंग बेतरतीब कर दिए ।

फिर न जाने कितने ग्राहकों ने
सुबह से शाम तक मुझे बरता और मैं
शाम तक
चिंदी चिंदी हो गई थी।

मलिक घर जाने लगा तो नौकर ने
मुझे फाड़कर किसी सामान के बाहर
लपेट दिया और बोला आज की अखबार
खत्म समझो
कल नई आ जाएगी ।

मैं अंदर ही अंदर कसमसाई
फर्श पर बिखरे मेरे टुकड़े बोले
मैं मरी नहीं जिंदा हूं
मेरे कई शब्द
लोगों के ज़हन में उतर गए हैं।

मुझे भले ही एक दिन की उम्र मिली थी
मैंने सबका मनोरंजन ज्ञानवर्धन किया
उनकी समस्याएं उठाईं और समाधान दिया है
फिर मैं मरी कैसे?
यह मेरा भ्रम नहीं वास्तविकता है।

इससे पहले कि मैं अपनी पीड़ा कुछ और कहती
दूसरी सुबह आ गई
मेरी सखी दूसरी अखबार मेज पर थी मालिक और
ग्राहकों की सेवा के लिए और मैं
टुकड़े टुकड़े हुई देख रही थी ये सब
नियति का खेल।

सच में
उम्र एक दिन की हो या बरसों की
यूं ही अखबार की तरह
बीत जाती है।
-अशोक दर्द
3 घंटे पहले
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