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कई राह थे मेरे सामने

Asha Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कई राह थे मेरे सामने
        
                                                    
                            
एक राह हमने चुन लिये,
उसी राह के जानिब कई
ख़्वाब हमने बुन लिये।
उसी राह पर चलते हुए
तक़दीर से हुआ सामना,
कहा उसने है मुश्किल बड़ा
पग-पग ज़रा सम्हालना।
इसी राह पर है सोज़ भी
इसी राह पर तेरा साज़ है,
है गुनगुनाती सुबह भी
यहीं पर अंधेरी रात है।
बड़े धैर्य से एक एक कदम,
रखते हुए मैं बढ़ चलीं
क्या सोज़ है क्या साज़ है
हर रंग में ढली मैं चली।
कुछ दर्द थे उसे सह गये
ज़ख़्मों को अपने सी लिया,
उन्हीं राहों पर हमें विष मिले
हमने उसे भी पी लिया।
करी कोशिशें हज़ार पर
संभलीं ना अपनी ज़िंदगी,
मिलीं ठोकरें हज़ार और
बिख़री रही ये ज़िंदगी।
फिर एक मक़ाम आया जहां
इस दिल के टुकड़े हो गए
मेरी ख़्वाहिशे मेरी हसरतें,
इन्हीं रास्तों में खो गये।
आंखों में खोए सपने है
सांसों में ठंडी आह है,
ठगे-ठगे से हम खड़े
दिखती ना कोई राह है।।
एक घंटा पहले
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