रह के खामोश, करते हैं बातें,
सुनते बहुत हैं, सुनाते नहीं हैं.
है मुहब्बत बे -इंतहा उनसे,
लेकिन कभी भी जताते नहीं हैं.
हैं ख़्वाहिश मिलने की उनसे,
मगर कभी भी बताते नहीं हैं.
रूठना न हमसे, भूल कर कभी,
हम वो शख्श हैं, जो मनाते नहीं हैं.
कर्ज़ा न देना हमें तुम कभी भी,
लेते हैं हम मगर, चुकाते नहीं हैं.
अकेला न होने देंगे तुम्हें हम,
पकड़ा जो हाथ, छुड़ाते नहीं हैं,
अरविन्द कुमार अग्रवाल