संकीर्णता के ,
कुछ बंद दरवाजे,
कभी नहीं खुलते,
चाहे सद्विचारों को,
कितना भी,
बड़ा उजियारा,
क्यों न हो जाये ।
शायद प्रतीक्षा करते है,
समय के प्रहार की,
उस क्षण की,
जब समीर का,
एक झोंका,
गिरा दे उसे,
और,
जगमगा सके,
वह संकीर्ण गलिया भी,
सद्विचारों के प्रकाश से।
यही सत्य है और शाश्वत भी,
जागेगा वसुधा का हर कण,
सद्विचारों की आंधी से,
आज नहीं तो कल,
बदलाव तो सुनिश्चित है,
हर मनु का,
कुछ का आज तो
कुछ का कल,
तो प्रसन्नता का तिलक,
हर मस्तक पर,
लगाते चले हम,
एक जनजागृति की,
अलख अपने हाथों में लिए।
-अरुणिमा बहादुर खरे ' वैदेही '