सियासत भर गई है गंदगी से,
वो बाज़ आते नहीं फिर भी बदी से
सुधारों की करी जब बात हमने ,
लगे हैं ज़ुल्म करने वो तभी से।
नशे में चूर सत्ता के रहे वो,
पड़ा भारी उलझना जेन ज़ी से।
तिरंगे के लिए है जान हाज़िर ,
नहीं डरते तुम्हारी हथकड़ी से।
उतारो वेद सारे आचरण में ,
मिलेगा कुछ न ख़ाली बंदगी से।