ये बता दे कि भला क्यूं तू ख़फा है मुझ से ,
कौन सा ऐसा बड़ा जुर्म हुआ है मुझ से।
जो मेरी साँस मेरे दिल में बसा है हर दम,
जाने क्यूं आज वो अनजान बना है मुझसे।
दूर मुझ से क्यूं बिना बात हुए जाते हो,
चैन दिल का क्यूं भला छीन लिया है मुझ से।
इन अदाओं का तो पहले ही से मारा हूं मैं,
इंतिहा ये कि वो फिर रूठ गया है मुझ से।
आज ख़ुशियों का नहीं कोई ठिकाना मेरी,
कोई हमदर्द गले आज मिला है मुझ से ।
है ज़ुबाँ पर तेरी इन्कार मगर ए दिलबर,
तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से।
- अरुण शर्मा