तेरी आँखें मृगनयनी, जैसे वन में भोर हो,
तेरी हँसी ऐसी लगे, जैसे चाँदनी का शोर हो।
तेरे मुखड़े की चमक में, चाँद भी फीका लगे,
तेरे अधरों की लाली में, गुलाब का रंग जगे।
तेरे गालों पर ठहरी, ओस की बूँदें लगती हैं,
तेरी ज़ुल्फ़ें सावन की, काली घटाएँ लगती हैं।
तेरी साँसों में बसी है, कस्तूरी जैसी महक,
तुझको देखूँ तो लगे, ठहर गई हो हर चहक।
तेरी चाल में लचक ऐसी, जैसे नदी की धार हो,
तेरी पायल की रुनझुन में, प्रेम का संगीत हो।
तेरी पलकों की छाँव में, शाम भी सोने लगे,
तेरे ख़्वाबों के नगर में, चाँद भी खोने लगे।
तेरी बिंदिया नभ का तारा, तेरी माँग में सवेरा,
तेरे चेहरे पर ठहरा है, जैसे चाँद का बसेरा।
तेरी मुस्कान की तुलना, किस उपमा से मैं करूँ,
तू कमल की कोमलता है, तुझको कैसे शब्द दूँ?
तू शबनम की नज़ाकत है, तू गुलाबों का निखार,
तू वसंत की पहली सरगम, तू बहारों का शृंगार।
तू राधा के प्रेम जैसी, तू मीरा का विश्वास,
तू मेरी कविता का भाव है, तू ही शब्दों की मिठास।
तेरी सुंदरता लिखूँ तो, चाँदनी कम पड़ने लगे,
तेरी आँखों को पढ़ूँ तो, उम्र भी कम पड़ने लगे।
तू कोई ख़्वाब नहीं है, जिसे सुबह भूल जाऊँ,
तू वो कस्तूरी है, जिसकी महक में खो जाऊँ।
तू उपमा नहीं किसी की, तू स्वयं एक मिसाल है,
तेरे सौंदर्य के आगे, हर अलंकार बेहाल है।