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ममता, मर्यादा और श्राप

Archana karna

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी, सौंदर्य की उजली छाया,
        
                                                    
                            
अर्जुन के तपस्वी तेज़ ने उसका मन हर पाया।
मोहित हुई वह वीर पर, हृदय में प्रेम जगा,
निडर होकर कह बैठी— “मेरा अनुराग स्वीकार करो, हे युगनायक सगा।”

अर्जुन ने सिर झुकाकर कहा, वाणी में संयम का भार,
“आप मेरी माँ हैं देवी, यह है मेरा विचार।
आप मेरे पूर्वज की पत्नी रह चुकी हैं पहले,
माँ और पुत्र के बीच ममता का बंधन होता है,
वासना नहीं, सम्मान ही उस रिश्ते की शोभा होता है।”
यह सुन उर्वशी का हृदय क्रोध से भर उठा,
अपमान की अग्नि में उसका धैर्य बिखर उठा।

क्रोध में बोली अप्सरा— “तू नपुंसक हो जाएगा,”
शाप की वाणी गूँजी, स्वर्ग काँप सा जाएगा।
पर कुछ ही क्षणों में जब शांति ने मन को छुआ,
क्रोध पिघला, विवेक जगा, हृदय ने राह को चुना।

उर्वशी ने फिर कहा— “शाप रहेगा केवल एक वर्ष,”
न्याय बना करुणा से, बदला उसका अर्थ।
इस कथा ने युगों को सिखाया एक गहरा ज्ञान—
मर्यादा से बड़ा कोई बल नहीं, संयम से ऊँचा नहीं स्थान
9 महीने पहले
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