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चितवन चातक सी चंचलता

ARAVINDA MOHUN

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            चितवन चातक सी चंचलता में रमता था कुतूहल
        
                                                    
                            
विधु बदन पर तिरती थी जो चाह,चपल चंचल,चुहल।।
उन पर क्रूर काल ने खींच दिये थे कुछ रेख विकल
पर नियति की इस नीयत को अब पुरुषार्थ करेंगे निष्फल।।
मन कभी न होगा विह्वल, हो गर सधे हुए चालों का संबल
संभल संभल चलने से आयेगी झिलमिल होती मंजिल।।
3 महीने पहले
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Manju Sharma

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