चितवन चातक सी चंचलता में रमता था कुतूहल
विधु बदन पर तिरती थी जो चाह,चपल चंचल,चुहल।।
उन पर क्रूर काल ने खींच दिये थे कुछ रेख विकल
पर नियति की इस नीयत को अब पुरुषार्थ करेंगे निष्फल।।
मन कभी न होगा विह्वल, हो गर सधे हुए चालों का संबल
संभल संभल चलने से आयेगी झिलमिल होती मंजिल।।
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