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मन कराहें दर्जन नहिं

अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मन काहें दर्पन नहिं बन पाए।
        
                                                    
                            
देखन चाहे आपनि छवि सुंदर।
नित ईर्ष्या मान बढ़ाए।
झूठ-मोह अरू सारे अवगुन,
अब काहें नज़र ना आए।
दुःख की नित छलकाए गागर,
लोभ की ताने लंबी चादर,
निज जीवन नर्क बनाए।
परमारथ से जिया चुराए,
पाप की गठरी बढ़ती जाए,
पुण्य का अवसर बीता जाए।।
मन काहें.....
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
2 महीने पहले
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