मन काहें दर्पन नहिं बन पाए।
देखन चाहे आपनि छवि सुंदर।
नित ईर्ष्या मान बढ़ाए।
झूठ-मोह अरू सारे अवगुन,
अब काहें नज़र ना आए।
दुःख की नित छलकाए गागर,
लोभ की ताने लंबी चादर,
निज जीवन नर्क बनाए।
परमारथ से जिया चुराए,
पाप की गठरी बढ़ती जाए,
पुण्य का अवसर बीता जाए।।
मन काहें.....
~अर्द्धचंद्रधारी त्रिपाठी
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