रिश्तों को बेड़ियां, प्रेम को पाखंड, सुख को भ्रम,
और दुःख को अंतिम सत्य लिखूँगा।
जहाँ हर एक वादा सिर्फ एक समझौता हो,
मैं उस हर कसमें को कोरा कागज़ लिखूँगा।
भीड़ से घिरे होने पर भी जो भीतर तक चीखती हो,
मैं उस खामोशी को अपनी तासीर लिखूँगा।
जिसे लोग इबादत समझकर सर झुकाते हैं,
मैं उस परछाईं को भी एक ज़ंजीर लिखूँगा।
कोई पूछे अगर सुकून का पता मुझसे,
तो मैं हर जलते हुए दिए की तकदीर लिखूँगा।
जो महफिलों में हँसकर अपनी जान बेचते हैं,
मैं उनकी बेबसी को भी तस्वीर लिखूँगा।
जहाँ रोशनी भी आकर अपनी औकात भूल जाए,
मैं उस अंधेरे को अपनी जागीर लिखूँगा।
उम्मीदों के शीशमहल पर जब पत्थर गिरेंगे,
मैं हर एक टूटे टुकड़े को अपनी ताक़त लिखूँगा।
जो सदियों से खुद को खुदा मानते आए हैं,
मैं उनकी हर एक साज़िश को बेसिर-पैर लिखूँगा।
खुद अपने ही साए से जो डरने लगे हैं लोग,
मैं उस खोखले वजूद की तहरीर लिखूँगा।
और जब मैं अपने जीवन के अंतिम शब्द लिखूँगा,
हर एक साँस के हिसाब को चुकता कर दूँगा,
मैं खुद अपनी चिता पर अपना ही इश्तहार लिखूँगा।
कोई निशान न बचे मेरी बेरुखी का इस दुनिया में,
मैं कागज़ की जगह अपनी पलकों पर विदाई का इकरार लिखूँगा।
जिस्म की इस मिट्टी को जब हवाएँ ले उड़ेगी आसमान में,
मैं उस खालीपन को भी अपनी जीत का आधार लिखूँगा।
और जब बुझ जाएगी वजूद की आखिरी मशाल भी अंधेरे में,
मैं उस ख़ामोशी के सीने पर एक नया संसार लिखूँगा...
और खुद अपने लहू से अपनी अंतिम तहरीर लिखूँगा।
-'अरविन्द '