विज्ञापन

ओ माँ

Anurag Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ओ माँ ,
        
                                                    
                            

मैं तेरा अनमोल रतन हूँ ,

तेरी आँखों का मैं दर्पण हूँ ,

मुझसे ही है तेरी दुनिया ,

तुझसे ही मेरा वतन है ,

क्या मांगू मैं खुदा से मन्नत ,

तेरे क़दमों में है मेरा जन्नत ,

गर्व से ऊँचा सदा तेरा माथ रहे ,

मेरे सिर में सदा तेरा हाथ रहे ,

न झुकेगी तेरी आँखें,

कभी मेरे कर्मों से ,

न होऊंगा कभी बिमुख ,

सदा मैं अपने धर्मों से ,

मरकर भी तेरा ऋण ,

कभी चुका न पाऊंगा ,

जब भी मिले ये जीवन,

तेरी शरण ही आऊंगा,

तू है,

तो ये जीवन आधार है ,

वर्ना सबकुछ निराधार है।



हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
 
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all