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कृष्ण पार्थ संवाद

Anurag Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कृष्ण पार्थ संवाद - " कृष्ण की पीड़ा "
        
                                                    
                            
शस्त्र नहीं उठाया मैंने, पर हर घाव सहा है पार्थ,
सब कुछ अपने भीतर मैंने, चुपचाप सहा है पार्थ!
भीष्म गिरे शर-शय्या पर, हृदय हुआ खंडित मेरा,
द्रोण गिरे रणभूमि में, टूटा युगों युगों का बंधन मेरा।
कर्ण! तुम्हारा सत्य पता था, फिर भी मौन रहा मैं,
कुंती की चीत्कार सुनी थी, चुपचाप सहा वह मैं।
अभिमन्यु जब घिरा अकेला, चक्रव्यूह के द्वारों में,
सुभद्रा का क्रंदन गूँजा, मेरे भी संसारों में।
धर्म जीता, सत्य जीता—पर विजय का क्या मोल हुआ?
कितने घर के दीप बुझे, कुल कितना निस्तेज हुआ!
व्याध का तीर लगा अंततः, त्यागी यह देह अकेली,
इतना समझो हे पार्थ! जय-पराजय एक समान है,
जिसने जीता, जिसने खोया, दोनों का एक निशान है
अपनी ही पीड़ाएँ अपने, हाथों होती राख हैं,
यहाँ कोई नहीं जीतता, केवल पीड़ाएँ जीत जाती है
वही सनातन सत्य रहेगा—शेष कथाएँ मिट जाती है
59 मिनट पहले
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