कवि यह गीत मत लिख तू,
अब किसी श्रृंगार का संगीत मत लिख तू।
कवि यह गीत मत लिख तू
फूंक दे अग्नि हृदय में क्रांति बाणों की,
और उससे फिर जगत के पाप संहारो।
हो न मध्यम फिर कभी ये क्रांति की ज्वाला,
और रिपु पाखंड को तुम शौर्य से वारो।
हो कर के अनिमेष निज पौरुष पर ही रहना,
तम छटेगा विजय होगी ये सदा कहना।
अब किसी दाम्पत्य का मनगीत मत लिख तू,
कवि यह गीत मत लिख तू
कवि यह गीत मत लिख तू।
करुण क्रंदन का ये स्वर है गूंजता अब घोर,
इस तरफ या उस तरफ फैला है तम चहुँ ओर।
भोग और विलास तक कविता नहीं बंधती,
सर्वदा निज राष्ट्र का निर्देश है करती।
ऐ कवि निज कल्पना को त्यागकर लिक्खो,
राष्ट्र की ये वास्तविकता जो बयां करती।
अब सदा निज राष्ट्र का जनगीत ही लिख तू,
कवि यह गीत मत लिख तू
कवि यह गीत मत लिख तू।
~ अनुराग अंकुर
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