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फिर से पता खोजने का मन ।

Anupama Arya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तीस साल पुरानी
        
                                                    
                            
एक चिट्ठी संभालकर रखी थी मैंने,
पता नहीं क्यों,
शायद कुछ रिश्ते
समय के साथ पुराने नहीं होते।

कल दीदी से बात करते-करते
उन्होंने कहा—
अगर उन भैया का
कोई आर्मी नंबर वगैरह मिल जाए,
तो उन्हें ढूँढना थोड़ा आसान हो जाएगा।

मन में एक अजीब-सी खुशी हुई,
क्या हम फिर से
उन भैया से मिल सकते हैं?

थोड़ा ढूँढने पर
उनका कोई पता मिला,
तो लगा—
अब तो आसान है उन्हें ढूँढना।

तब मन में बस एक ही सवाल आया—
जब हम मिलेंगे तो क्या होगा?
वो मुझे पहचानेंगे,
या कितना बदल गए होंगे?

हम भी तो
वैसे नहीं रहे।

तब मन में पुरानी कुछ स्मृतियाँ जागीं,
याद धुंधली थी,
पर चेहरा अब भी जाना-पहचाना था।

दिल में एक सिहरन थी,
आँखों में कुछ आँसू,
और चेहरे पर पसीने की
कुछ बूँदें थीं।

साथ में एक नंबर भी मिला,
लगा—
यह नंबर डायल करके देखते हैं।

नंबर मिलाते ही
दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई—
“हेलो, आप कौन?”

लगा, उनसे लड़ूँ,
झगड़ूँ,
इतने दिन गायब रहने का
कारण पूछूँ।

फिर थोड़ा संभलकर
अपना नाम बताया,
उधर से भी आवाज़ आई—
“सॉरी, रॉन्ग नंबर।”

“मैं ऐसे किसी शख्स को नहीं जानता।”

और बस,
फोन बंद हो गया—
एक सॉरी पर।

दुख के साथ
एक खुशी भी थी—
दोबारा कोशिश करने की।

तुरंत दीदी को फोन मिलाया,
और हम फिर से
उस पल की कुछ यादों में खो गए।

लगा, वो अब कितने बूढ़े हो गए होंगे,
क्या उन्हें कुछ याद होगा—
मेरा चेहरा,
मेरी बातें,
उस पल का कुछ भी।

वो छोटी-छोटी बातों पर लड़ना,
वो झगड़ना,
वो अपनापन,
वो स्नेह।

फिर उसी पत्र पर हाथ गया,
लगा—
यह पत्र, यह पता
कुछ तो सोचकर
अब तक मेरे पास होगा।

क्या यह मुलाकात
सिर्फ़ एक पल की होगी,
या फिर यादों का
कोई नया घरौंदा बनेगा।

इसी ख्वाब के साथ
अब पत्र की जगह बिस्तर था।

कब नींद आई
पता ही नहीं चला।

अगले दिन
फिर वैसी ही सिहरन थी,
बस।
एक महीने पहले
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